मुंबई. दक्षिणपंथी संगठन ‘सनातन संस्था’ ने शुक्रवार को कहा कि तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड में अदालत का फैसला उन लोगों की पराजय है जिन्होंने ‘हिंदू आतंकवाद की साजिश’ रची. गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के मामलों से संबंधित विशेष अदालत ने शुक्रवार को दाभोलकर के दो हमलावरों –सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को दोषी ठहराया एवं उन्हें उम्रकैद की सजा सुनायी लेकिन सबूतों के अभाव में आरोपी कान-नाक-गला (ईएनटी) विशेषज्ञ चिकित्सक वीरेंद्रसिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को बरी कर दिया.

सनातन संस्था आरोप लगाती रही है कि जांच एजेंसी सीबीआई ने दाभोलकर हत्याकांड में उसके सदस्यों को फंसाने की कोशिश की और गलत तरीके से उसके ‘साधकों’ (अनुयायियों) को फंसाया. सनातन संस्था के प्रवक्त अभय वर्तक ने पुणे में संवाददाता सम्मेलन में कहा , ” यह फैसला उन लोगों की पराजय है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद की साजिश रची. यह कम्युनिस्ट इकोसिस्टम की भी हार है जिसमें दाभोलकर की बेटी मुक्ता और बेटे हामिद को अनुचित भरोसा था.”

उन्होंने दावा किया, ” पूर्ण रूप से देखा जाए , तो यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि इस मामले की जांच संदिग्ध थी. अदालत ने इस मामले से यूएपीए की धाराएं हटा दीं जो यह संकेत देता है कि देश में हिंदू आतंकवाद को साबित करने के लिए यह मामला रचा गया था.” वर्तक ने कहा कि डॉ. दाभोलकर की 20 अगस्त, 2013 को सुबह सात बजकर 20 मिनट पर हत्या की गयी थी और महज डेढ़ घंटे के अंदर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मीडियार्किमयों से बातचीत में कहा कि शायद हिंदुत्व समर्थक लोगों ने यह हत्या की हो , इस तरह उन्होंने जांच को भटकाया.

सनातन संस्था के पदाधिकारी ने कहा, ” एक जिम्मेदार पद पर आसीन होने के बावजूद एक व्यक्ति द्वारा ऐसा बयान दिया जाना अनुपयुक्त था लेकिन उन्हें इस देश में हिंदू आतंकवाद का विमर्श गढ़ना था. और उसी के हिसाब से उन्होंने हिंदुत्व संगठनों पर ठीकरा फोड़ दिया.” उन्होंने कहा कि अदालत ने 11 सालों के बाद अपना फैसला दिया लेकिन इन सालों के दौरान ‘हम अपमान एवं अनादर झेलते रहे.”

वर्तक ने कहा, ”इस मामले में कुछ निर्दोष लोगों को फंसाया गया… प्रगतिशील लोगों का एक गिरोह है, शहरी नक्सलियों एवं कम्युनिस्टों की साठगांठ है जिसने हिंदुत्व संगठनों को बदनाम किया एवं यह फैसला उनके लिए एक जवाब है.” उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसी पर दबाव डाला गया. उन्होंने कहा, ” ईएनटी चिकित्सक वीरेंद्रसिंह तावड़े की जिंदगी बर्बाद हो गयी क्योंकि उन्होंने अदालत से बरी होने से पहले आठ साल जेल में गुजारा.” उन्होंने कहा कि भावे और पुनालेकर के साथ भी ऐसा ही हुआ.